Bhagavad Gita: अध्याय 11, श्लोक 45

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा
भयेन च प्रव्यथितं मनो मे |
तदेव मे दर्शय देवरूप
प्रसीद देवेश जगन्निवास || 45||

अदृष्ट-पूर्वम्-पहले कभी न देखा गया; हृषितः-अति प्रसन्न; अस्मि-मैं अति प्रसन्न हूँ; दृष्ट्वा-देखकर; भयेन भय से; च-भी; प्रव्यथितम्-कम्पन; मन:-मन; मे–मेरा; तत्-वह; एव–निश्चय ही; मे-मुझको; दर्शय-दिखलाइये; देव-परम प्रभु; रुपम्-रूप; प्रसीद-कृपया करुणा करके; देव-देवेश; जगत्-निवास हे ब्रह्माण्ड के आश्रय।

अनुवाद

BG 11.45: पहले कभी न देखे गए आपके विराट रूप का अवलोकन कर मैं अत्यधिक हर्षित हो रहा हूँ और साथ ही साथ मेरा मन भय से कांप रहा है। इसलिए हे देवेश, हे जगन्नाथ! कृपया मुझ पर दया करें और मुझे पुनः अपना आनन्दमय स्वरूप दिखाएँ।

भाष्य

भक्ति दो प्रकार की होती है-एक ऐश्वर्य भक्ति और दूसरी माधुर्य भक्ति। ऐश्वर्य भक्ति में भगवान के सर्वशक्तिशाली स्वरूप के चिन्तन द्वारा भक्त भक्ति में तल्लीन होता है। ऐश्वर्य भक्ति में भय और श्रद्धा के भाव की प्रधानता होती है। ऐसी भक्ति में भगवान से दूरी और शिष्टाचार का पालन करना सदैव आवश्यक समझा जाता है। द्वारकावासी और अयोध्यावासी ऐश्वर्य भक्ति के उदाहरण हैं, जो श्रीकृष्ण और भगवान श्री राम का आदर-सम्मान अपने राजा के रूप में करते थे। सामान्य नागरिक अपने राजा के प्रति अत्यंत निष्ठावान और आज्ञाकारी होते हैं यद्यपि उनके उसके साथ कभी घनिष्ठ सम्बंध नहीं होते। 

माधुर्य भक्ति में भक्त भगवान के साथ करीबी संबंध का अनुभव करते हैं। ऐसी भक्ति में यह भाव प्रमुख रहता है कि 'श्रीकृष्ण मेरे हैं और मैं उनका हूँ।' वृंदावन के ग्वाल-बाल जो श्रीकृष्ण से सखा भाव से प्रेम करते हैं, यशोदा और नंद बाबा जो कृष्ण से अपने पुत्र के रूप में प्रेम करते हैं और गोपियाँ जो उनसे अपने प्रियतम के रूप में प्रेम करती हैं, ये सब माधुर्य भक्ति के उदाहरण हैं। माधुर्य भक्ति ऐश्वर्य भक्ति की अपेक्षा अत्यंत मधुर है। जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज वर्णन करते हैं-

सबै सरस रस द्वारिका, मथुरा अरु ब्रज माहिँ। 

मधुर, मधुरतर, मधुरतम, रस ब्रजरस सम नाहिँ ।।

(भक्ति शतक श्लोक-70) 

भगवान का दिव्य आनन्द उनके सभी रूपों में अत्यन्त मधुर होता है किन्तु फिर भी इसकी कुछ श्रेणियाँ हैं। भगवान की द्वारका की लीलाओं का आनंद 'मधुर' और मथुरा की लीलाओं का आनन्द 'अति मधुर' तथा ब्रज की लीलाओं का आंनद मधुरतम है। 

माधुर्य भक्ति में भगवान के ऐश्वर्य और सर्वशक्तिशाली स्वरूप को भुला दिया जाता है। भक्त भगवान कृष्ण के साथ चार प्रकार से संबंध स्थापित करता है। 

दास्य भावः श्रीकृष्ण हमारे स्वामी हैं और मैं उनका सेवक। स्वयं को श्रीकृष्ण का दास मानने जैसी रक्तक और पत्रक आदि की भक्ति दास्य भाव की भक्ति थी। भगवान को अपनी माता और अपना पिता मानने का भाव भी दास्य भक्ति की ही श्रेणी में है।

सख्य भावः श्रीकृष्ण हमारे सखा हैं और मैं उनका अंतरंग सखा हूँ। श्रीदामा, मधुमंगल, धनसुख, मनसुख की भक्ति सखा भाव की भक्ति थी। 

वात्सल्य भावः श्रीकृष्ण हमारे बालक हैं और मैं उनका माता-पिता हूँ। यशोदा और नंद की भक्ति वात्सल्य भाव की भक्ति थी। 

माधुर्य भावः श्रीकृष्ण हमारे प्रियतम और मैं उनकी प्रेयसी हूँ। वृंदावन की गोपियों की भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति थी। 

अर्जुन सखा भाव वाले भक्त हैं और भगवान के साथ बंधुत्व के संबंध का आनन्द पाते है। भगवान के विराटरूप और दिव्य रूप को देखकर अर्जुन को विस्मय और श्रद्धा का अनुभव होता है किन्तु फिर भी वह सख्य भाव का माधुर्य चाहता है जिसका आस्वाद ग्रहण करने का उसे पूर्व से ही अभ्यास था। इसलिए वह श्रीकृष्ण से अपने सर्वशक्तिमान विराट स्वरूप जिसे वह अब देख रहा है, को छिपाने और पुनः मानव रूप में प्रकट होने की प्रार्थना करता है।

Bookmark this Verse

Sign in to save your favorite verses.

Add a Note
Swami Mukundananda
11. विश्वरूप दर्शन योग

किसी भी श्लोक पर तुरंत जाएँ

जिस ज्ञान की आप खोज कर रहे हैं, सीधे वहाँ पहुँचें

Book with feather

अपनी गीता प्राप्त करें

Bhagavad Gita — The Song of God भगवद्गीता
The Song of God
Order Now
Bhagavad Gita for Everyday Living Bhagavad Gita for
Everyday Living
Order Now

जुड़े रहें!

आज का श्लोक

पवित्र भगवद्गीता के शाश्वत प्रेरणादायक ज्ञान से अपना दिन शुरू करें, जो सीधे आपके ईमेल पर पहुँचे!

"धन्यवाद! हमने आपको ईमेल लिस्ट में जोड़ लिया है।

Get Your Own Gita
Bhagavad Gita — The Song of God

भगवद्गीता
The Song of God

Order Now
Bhagavad Gita for Everyday Living

Bhagavad Gita for Everyday Living

Order Now
What's New in
Holy Bhagavad Gita
  • Redesigned home, verse, and chapters pages
  • Personal accounts — sign in with email, phone, or Google
  • Bookmark verses and save notes on any verse
  • Track your reading progress across all 18 chapters
  • Quick-jump to any verse
  • Full site now available in all 6 languages
  • Overall visual polish and consistency